तूफ़ानों में भी जिसने दिया साथ बेख़ौफ़,
वो दोस्त है, कोई आम नहीं होता।
हर मोड़ पे जिसने मुझे सच से मिलाया,
आईना था, मगर जाम नहीं होता।
जिसने नज़रअंदाज़ की मेरी कमज़ोरियाँ,
वो दोस्त है, मेरा इम्तिहान नहीं होता।
जो हँसी में भी मेरी तन्हाई पढ़ ले,
वो शख़्स यूँ ही मेहरबान नहीं होता।
वो जो चुपचाप दुआएँ देता रहे,
उसका नाम ज़बां पे आम नहीं होता।
"फ़ाज़िल", निभाई जो उसने हर एक रस्मे-वफ़ा,
ऐसा रिश्ता हर इक आम नहीं होता।
