मुस्तक़बिल को दफन कर  

आज को जताने आये हैं 

रगो में बहते पानी को उकसाने आये हैं 

जड़ोंको अपनी खुद ही काट दो 

शाखों से बहते खून को पोछो  

कल के जख्मों को टटालो कुरेदो, और जोश में आओ 

एक नए  आगाज़  का इन्तिज़ार खत्म हुआ 

आग से उल्फत  

और फिर  चीखता सन्नाटा