कभी-कभी मुलाक़ात का मन नहीं होता

हर वक्त मुज़ाकरात का मन नहीं होता


दुनिया बहुत ख़ुदग़र्ज़ है दोस्त, इसलिए

ज़ाहिर-ए-जज़्बात का मन  नहीं होता


यार परिंदों को छोड़ दे कुछ वक्त आज़ाद

कैद में कभी करामात का मन नहीं होता


गुलुकार भी इंसान है समझती नहीं दुनिया

उसे भी हर वक्त नग़्मात का मन नहीं होता


-Farhan Ashraf