अकेले इन राहो पर मैं चल पड़ा हु,
आकाश से जमी तक कोई ना हो हाथ,
फ़िर भी मैं लड़ पड़ा हू,
ना सूर्य का प्रकाश चाहिए ना चंद्रमा का निहार चाहिए,
संकल्प है मेरा दृढ़ निश्चय की आवाज़ चाहिए,
जिनको असमान में हो आस वो सवारते रहे,
मेरा जो इम्तिहान है अब उसके लिए ही मेरी जान है
ये जो मेरा विश्वास है मेरे हृदय की गतिविधियों के केहर का असार है
अब मेरे तेज से आसमान और जमी तुम्हें बदलना होगा
हो कितने भी परिस्थितियों वाचक शब्द अब तुम्हें गलना होगा,
