वो ज़िंदा रहने की कोशिश अगर नहीं करता

तो ज़िंदगी  का कोई ग़म असर नहीं करता

 

वो बोलता  है बहुत  कुछ किनारे पर ही से

समंदरों का  वो लेकिन  सफ़र नहीं करता


वो  मेरे  वास्ते  रोता  नहीं  तो  क्या कीजे

वो अपने ग़म की भी मुझको ख़बर नहीं करता


हर एक  बात  कलेजे  से  लगा  लेता है

अजीब दिल है कि कुछ दर गुज़र नहीं करता


वो जब तलक तुझे इल्हाम ना हो चलने का

सो काम कोई  भी तब तक हुनर नहीं करता


वो साथ होता है तब तब सुकून मिलता है

मगर वो बाद  मुझे  मुंतज़र  नहीं  करता


यहीं  सुकून  है  रुस्वा  मुझे  नहीं  करता

मेरी  कमी  को ख़ुदा  मुश्तहर  नहीं करता


शजर को छोड़ के जाते है हर बरस पत्ते

मगर ख़ुदा से शिकायत शजर नहीं करता


मैं जिसके नाम लुटाता हूँ अपने लफ़्ज़ों को

वो  मेरे  नाम  पे  ज़ेरो ज़बर नहीं करता


लगा के बैठा है वो कान लब नहीं खुलते है

ये दिल किसी को भी नज़दीक तर नहीं करता


वो जब तलक कोई मरता नहीं यहाँ तब तक

कोई भी  शख़्स किसी की क़दर नहीं करता


-Faiz