खाक - खाक राख सा मढ़ गया मै पुतला
खोखला मुनीर मै आत्मा का भूखा
राह - राह भटका हज़ारों बार भटका
जंजीर से जहां मे ज़ंख सा लगा हूं,
न बार - बार मार से न ही अंगार से छूटा,
ज़ख्म है दाग है भरे हुए है चाम पे
मरहम नागवार
अग्नि है विदुषी अंधकार विद्वान है
पता नहीं इस अंधकार भरी राह मे
कौन साथ चला कौन रास्ते मे टूटा,
बैरी उदार थे बैर करके लूटा
अपने ही ग़द्दार थे अपना कर के लूटा,
लुटा लुटा के यार मै कंकाल होके टूटा
मिल गया मै रेत से जो राख का था पुतला।


