आप सभी आये दिन इन भावनाओ से चित परिचित होते हैं, कुछ लोग उसे लेखनी के माध्यम से तो कुछ एक दूसरे से बात करके मन को शांत कर लेते है।मैंने उसका एक छोटा सा अंश कुछ पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। आज कल मुझे लगता है, हमारी संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। बस इसी को जगाने का एक प्रयास।
आशा करता हूँ ,आप सभी इससे ख़ुद को जोड़ पायेंगे।
ये पंक्तियां लॉकडौन के दौरान कुछ घटनाओं की तरफ आपके ध्यान को ले जाने का प्रयास करेंगी।
दो मिनट।
जो इधर उधर से फुर्सत मिले तो
दो मिनट खुद को उधार दो,
इतना भी नही कर सकते, तो,
जिंदगी ये धिक्कार दो,
अरे! क्या तुम्हें सिहरन नही होती,
क्या अपनो की बेबसी देखते नही?
या वो काँपते होंठ, तुम पढ़ नही सकते?
क्या जब अपना खून बहेगा, तभी अपना कहोगे?
या जब ख़ुद मरोगे, तभी थमोगे??
अरे! बस करो, तुम पथरा गये हो,
हाड़-मांस के साथ हो, पर आत्मा मार गये हो।
क्या, इधर शमशान गये हो?
नहीं गये, तो सुन लो,
जिन्हें चार लाते थे,
साथ लेकर बारात आते थे,
उन्हें अब यूँही, फेक देते हैं,
अरे! किस धर्म की बात करते हो?
जलाना क्या दफनाना क्या?
सब अब यूँही छोड़ देते है।
पूछो उनसे, जो उन्हें आखिरी वक़्त भी,
बस 6 फ़ीट से देखते है, बस रोते है,
और कुछ ना कहते है,
अब भी, गर, आँख ना भरे!
समझ लो तुम खुद्दार हो,
इंसानियत के गद्दार हो,
देखो, उस वार्ड में, जहाँ,
एक नर्स और दस साथ हो,
अरे! जिसे सिस्टर कहते थे,
वो खुदा हो गयी,
उनके संग वो भी फना हो गयीं,
वो आला लटकाए, आज भी इस उम्मीद में होगा,
कल जब ये छटेगा तो घर को लौटेगा,
पर क्या वो कल होगा? ये सब कब थमेगा?
जानते हो,
हाथ-धोते-धोते, फफोले पड़ गये,
दवा सूंघते-सूंघते नाक सिकुड़ गये,
अब आदत पड़ गये हैं।
आया था वो, एक लिबास में,
महीनें गुज़र गये हैं।
भईया! मरना नही है,
सब यही कहते रहते है,
रोज सुनते- सुनते
अब कान उसके पक गये हैं,
ख़ैर,
अब तो ये भी कम हो रहे है,
हम-तुम तो कमरों में पड़े पड़े सड़ रहे है,
क्या तुम्हें अब भी कुछ समझ नही आता,
क्या तुम्हें अपनो का चेहरा नज़र नहीं आता,
अपनी दुनिया मे इतना रम चुके हों?
अपने ही आँसू, पी चुके हो,
या जीते जी,
अपनो को दफ़्न कर चुके हो?
क्या तुम सच मे, मर चुके हो?
या! बस जिने का ढोंग करते हो?
अरे! बस करो, ये दिखावें अब बन्द करो,
गर, अब थोड़े से हिले हो,
तो, बस दो मिनट, खुद को उधार दो,
दो मिनट, अपनो को उधार दो।
अनुहिम।।
हिमांशु।
गोरखपुर।
विधि में स्नातक
दिल्ली विस्वविद्यालय।


