बदल तो रहा है
कुछ कुछ सब
क्या नहीं दिख रहा तुम्हें ?
आओ बताते हैं हम तुम्हें !
पहले न पड़ती थी
गर्मी
इतनी कभी
पहले न पीते थे
पानी
खरीद कर कभी।
अब तो कब आती है
सर्दी
पता ही नहीं चलता
अब तो
न जाने कहां से आती है
बेमौसम की " धुंध "
दिल्ली में
इतला कर जाती है
बढ़ रहा प्रदूषण
दुनिया में।
होश में तो हम
तब भी ना आते
सुनते जब पड़ी है
बर्फ
मरुस्थल राजस्थान में।
जब तुम
जाते हो शहर
ढूंढते हो पानी की दुकान
पी कर हो जाते
हो तृप्त
पर सोचते नहीं
जो ये हालात बने हैं
खरीदकर पानी पीने पड़े हैं
हैं जिम्मेदार कौन ?
अब तो
गांव में भी हैंडपंप नहीं दिखते
जो दिखते वह पानी साफ
कहां उगलते ?
दिख रहा
बिक रहा है
गांव में भी
डिब्बे वाला पानी पानी ।
अब सूरज भी
कहाँ
सिर्फ रोशनी बिखेर रहा है
अब तो वह भी
अल्ट्रावायलेट किरणों को
संग ला रहा है ।
हमारा ही प्रदूषण
हमारे छत में
छेद कर रहा है।
हम तो कर रहे
नाइंसाफी पृथ्वी के संग
नहीं छोड़ रहे हैं
कसूर कोई करने में
उसे बदरंग ।
जंगल काट कर
कंक्रीट के जाल बिछा रहे हैं
पेड़ काटकर
हाईवे बना रहे हैं
विकास जरूरी है !
पर
कटे जितने भी पेड़
उसे लगाने की जिम्मेदारी से
क्यूँ भाग रहे हैं ?
बदल तो रहा है
कुछ कुछ सब