कितना कुछ था
जो डराता था अतीत में
लगता था पार हो नहीं दिखेगा
नया सवेरा
पर दिखा सूरज
पहले से ज्यादा चमकीला
कितना कुछ है जो डराता है
वर्तमान में
पर अतीत में न टिका जो तम
वो भविष्य तक भी न जाएगा
एक एक दिन जीत
अगले दिन तक की यात्रा
हौसलों से ही तो तय होती है