बडी बदहवासी सी है कुछ दिनों से,

हँसी ठिठोली हो जाती थी जिन बातों पर

नदारद मुस्कान तक हो गयी है अब


कतई अनजान था वो, ऐसा तो नही है

दिख जाता था वो गली के नुक्कड़ पर,

चौराहे की लालबत्ती पर


एक दो बार वो आया था दोस्तो-रिस्तेदारो के साथ भी,

अरे हाँ याद आया उस दिन भी तो आ धमका था दीवाली के रोज भी

लगा था इसकी तो आदत खराब है या ये सोच आया है

कि

दीवाली के रोज उसे भी मिल जाएगा कुछ


चंद रोज से वो ज्यादा दिखने लगा था

बेचैनी सी महसूस होने लगती थी

लेकिन वो था कि मुस्कराने लगता

कैसे कहूं उसको, मुझे कतई नही सुहाती मुस्कराहट उसकी

ना तो वो दोस्त ही था ना ही वो दुश्मन

फिर भी क्या कोई मुस्कराने लगेगा किसी को देखकर?

बेशक हम पूरी तरह अनजान ना थे।


उस रोज तो बस हद ही हो गयी

सब बैठे बड़े खुश गोया जन्नत में हो

वो आया लेकिन किसी को न जाने क्यों दिखता नही था

घुसपैठ कर गया हो जैसे


ज्यादा परेशानी पहले तो नही होती थी

मुस्करा कर मिल लेते थे अजनबियों तक से

ठहरे थे दिन कई उनके साथ

लेकिन इन जनाब की नीयत ठीक नही लगती

ये तो हिस्सा मांगने लगा है या सही कहूँ तो

मेरे अख्तियार तक पर सवाल उठाने लगा है।


खुद के वजूद पर ऐसे सवाल तो उठते देखे ना थे पहले,

जो थे हमसफ़र वो भी साथ छोड़ने लगे है अब तो

डर लगता है ये सोच कर कि

क्या होगा, जम के बैठ गया अगर


और देखूं तो क्या शख्सियत है इसकी

महज था जो कल तक

एक "आवारा विचार"