और पता है ?
मुद्दतो से जिन ख्वाब को सजा रखा है
वो ना पुरे होते है
ना मै उन्हें देखना छोड़ रही हु
अब आँखे भी थक चुकी है
कोई सवाल नही करती !!!!
सुनो !
अब सब कुछ अजीब सा लगता है
सब कुछ रुका सा लगता है
सफ़र भी आखरी सा लगता है
बदलाव !
अब बस एक तलाश सी रहती है
खुले आसमा से मिलने की
मुड़ कर कभी ना देखने की
खामोश दरिया से बहने की
कही दूर जाने की !!!!!!!
~एकता पाठक


