धन के बल पर ग्रह का दोहन,

और अतिरेक मानवों का शोषण,

जन से जन का यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं |


बढ़ना जीवनपथ पर तनहा,

परस्पर बैरी, कटुता, घृणा,

मन से मन का यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं |


इकतरफ़ा चाहत की सनक,

अप्राप्य को पाने की तड़प,

सच से मन का यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं |


कट्टरता का विषपूर्ण भुजंग,

अपने ही मत में मदहोश मलंग,

बुद्धि से नर का यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं |


स्त्री की इच्छाओं का दमन,

पुरुष का नाजायज़ अहम,

नर से नारी का यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं |


अलग ही दुनिया में जीना,

संग होकर संग में ना होना,

तुम से मेरा यह विभाजन,

मुझको मंज़ूर नहीं ||