दो पैरों पर सीधा चलके,

वस्त्रों को धारण करके,

कंदराओं से निकलके,

क्या पाया, तूने मानव ?



सरिता में विष मिलाकर,

तरुवर की छाँव मिटाकर,

नगरों में खुद को बसाकर,

क्या पाया, तूने मानव ?

 

निर्बल पर बल चलाकर,

रुधिर को व्यर्थ बहाकर,

दौलत को खूब जुटाकर ,

क्या पाया, तूने मानव ?

 

परमार्थ को भुलाकर,

कुकर्मों को अपनाकर,

दमन के पथ पर जाकर,

क्या पाया, तूने मानव ?