ए माया ! तू क्या करती है ?

सुख के लम्हों को हरती है,

पुलकित मन में गम भरती है,

माथे की लाली हरती है,

भरी कोख सूनी करती है,

पालक का साया हरती है,

जीते-जी मुर्दा करती है,

अल्पायु में प्राण हरती है,

ए माया ! तू क्या करती है ?