निशा की अंतिम वेला है,

जगमग-जगमग टिमटिम तारे,

चंद्र लुप्त है, लोप है जीवन,

सुप्त हैं स्वप्नशय्या पर सारे |

 

सुर्ख रवि की महिमा देखो,

उषा का है हुआ आगमन,

चढ़ते सूर्य की ऊष्मा से,

तिमिर का अब होगा गमन |

 

पहली किरण के साथ ही,

गूँजे चहुँ ओर मुर्गे की बांग,

कोयल कूके मयूर नाचे,

गिलहरियाँ मारे टहनियों पर छलांग |

 

गूँज उठे हैं मंदिर में शंख,

पढ़ी जाने मस्ज़िदों में अज़ान,

बजने लगी गिरजाघर की घंटियां,

गुरूद्वारे में गुरुबाणी का गान |

 

दिनचर निकले स्वप्नलोक से,

निशाचर स्वप्न में समाए,

जीवन जाग्रत होता जगत में,

जब तम पर प्रकाश फ़तेह पाए |


पशु पक्षी सब जीव मनुष्य,

प्रकृति के सारे वरदान,

शीश झुकाकर करें नमन सब,

नभ पर दिनकर शोभायमान ||