सुसज्जित जिन बाजारों में,

गलियों में और चौबारों में,

बहती थी जीवन की धारा,

रहता अस्पष्ट सा एक शोर,

बसता था मानव का मेला,

क्रय-विक्रय की बेजोड़ होड़ |

वहाँ पसरा अब सन्नाटा है,

दहशत से कोई ना आता है,

अपने ही घर में हर कोई,

खुद को बंदी अब पाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


वीरान उन मैदानों में,

कब्रिस्तानों में श्मशानों में,

एकाध ही दिन में आता था,

संग अपने समूह लाता था,

विस्तृत विभिन्न रीतियों से,

माटी में वह मिल जाता था |

वहाँ मृतकों का अब तांता है,

संबंधी संग ना आता है,

अंतिम क्षणों में भी देह,

समुचित सम्मान ना पाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


शहर के उन बागानों में,

युगलों की पनाहगाहों में,

जहाँ चलते थे बल्ला और गेंद,

सजती थी यारों की महफ़िल,

खिलते थे विविधाकर्षक फ़ूल ,

जो थे सप्ताहांत की मंज़िल |

वहाँ सजती अब चिताएँ हैं,

मरघट बनी वाटिकाएँ हैं,

अस्थि के फूलों को चुनकर,

कलशों में समेटा जाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


आधुनिक दवाखानों में,

खूब चलती उन दुकानों में,

रोगों के भिन्न प्रकार थे,

उतने ही अलग उपचार थे,

आशा से रोगी जाता था,

अक्सर ठीक होकर आता था |

वहाँ बस अब एक ही रोग है,

जिसका ना कोई तोड़ है,

उखड़ती साँसों से बोझिल,

स्थापित तंत्र लड़खड़ाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


कोलाहली कारखानों में,

व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में,

दूरस्थ स्थानों के बाशिंदे,

करते थे श्रम दिन और रात,

रहता था मस्तक पर पसीना,

मन में सुखमय जीवन की आस |

वहाँ उड़ती अब धूल है,

मरना किसको कबूल है,

नगरों से वापस अपने गाँव,

पैदल ही जत्था जाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


टूटी-फूटी उन सड़कों पर,

गुफा समतुल्य गड्ढों पर,

चलते थे वाहन कई प्रकार,

रहती थी दिनभर भीड़-भाड़,

इक-दूजे से आगे होने में,

होती थी अक्सर तकरार |

वो सड़कें सारी कोरी हैं,

ना वाहन है ना बटोही है,

अब अक्सर उन मार्गों पर,

रसायन छिड़का जाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


विद्या के उन संस्थानों में,

शिक्षण प्रतिष्ठानों में,

जहाँ हरदम चहकते चेहरे थे,

दोस्ती के रिश्ते गहरे थे,

शिक्षा का प्रसाद मिलता था,

कलियों से फूल खिलता था |

वहाँ लटका अब ताला है,

ना कोई पढ़नेवाला है,

ज्ञान के अनुयायियों का,

दूभर-दुष्कर हर रास्ता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है | 


छोटे-बड़े परिवारों में,

घरों में, त्योहारों में,

लोगों का आना-जाना था,

मिलने का सदा बहाना था,

सुख-दुःख के सब साथी थे,

हर मोड़ पर साथ निभाते थे |

अब सब घरों में बंद हैं,

ना मिलते हैं, ना संग हैं,

घर ही दफ़्तर कहलाता है,

कोई कहीं ना जाता है,

बहते-बहते एकाएक,

वक़्त कितना बदल जाता है ||