वो बेफिक्री, वो मस्ती और वो नादानी,

वो शेरों की चिड़ियों-परियों की कहानी,

वो सड़कों पर कल-कल बहता बरखा का पानी,

उसमें तैराने को कागज़ की कश्ती बनानी,

वो चुपके से पैसे देती दादी-नानी,

वो आँचल की गहरी निद्रा सुहानी,

वो यारों संग धूप में साईकिल दौड़ानी,

वो बागों में मटरगश्ती और शैतानी,

वो दौर था जब खुशियों की सीमाएं थीं अनजानी,

वो दौर था जब हमने जग की सच्चाईयाँ थीं ना जानी,

ये कैसा एकांत लेकर आई है जवानी,

इससे तो बेहतर थी बचपन की नादानी ||