वक्त के पहियों से भी गतिमान थी ज़िंदगी,

वक्त की भांति ही सतत चलायमान थी ज़िंदगी,

वक्त के पहिये ने रुख ऐसा अपना मोड़ लिया,

रैन के उपरांत सूरज ने निकलना छोड़ दिया,

कष्टों के सैलाब में इंसान मानो बह गया,

जो जहाँ था वो वहीँ पर बस, रह गया,

आस है तम को भेदती फिर घाम हो,

पूर्ण नहीं ये जीवन का बस एक अल्पविराम हो ||