मस्तक की बूंदों से मैंने,

सींची है तेरी ज़मी,

मस्तक की सारी बूँदें हैं,

ऐ वतन, तेरे लिए |

 

लहू की बूंदों से मैंने,

खींची है तेरी सरहद,

रक्त का अंतिम कतरा भी,

ऐ वतन, तेरे लिए |


माथे की लाली को मैंने,

किया तुझपर कुर्बान,

कोख का बालक भी मेरा,

ऐ वतन, तेरे लिए |

 

वक्त के लम्हों को मैंने,

तेरी सेवा में बिताया,

हर पल हर श्वास मेरी,

ऐ वतन, तेरे लिए ||