चाय पर लिखना बनता है, क्योंकि आजकल चाय से बहुत दूर हूं मैं। बिल्कुल तुम्हारी तरह, याद सताती है, पर क्या करूं मजबूर हूं मैं।। एक समय था जब रोज चार- पाँच 'कटिंग' पी लेता था। यूं तो 'लखनऊ' में तनाव था, पर चाय के सहारे जी लेता था।। भारत में चाय मतलब मोहब्बत का पैमाना, जैसे चाय हर आग बुझा सकती है। कोई मेहमान आए, लड़की दिखाई जाए, या दुश्मनी,चाय से हर बात सुलझाई जा सकती है।। चाय के होटल पर काश्मीर, राम मंदिर जैसे मुद्दे पर लोग लड़ जाते हैं। व्यापार, मकान, ज्ञान कभी भगवान और कभी प्यार में पड़ जाते हैं।। चाय में एक बड़ी 'खास' बात यह है कि यह सबके लिए 'आम' होती है। भेदभाव नहीं करती स्त्री, पुरुष, बच्चे सबके लिए समान होती है।। भूला नहीं हूं मैं, नाइट शिफ्ट 'कृष्णा नगर' में चाय पीते हुए गाली देना बहुत आम था। दिन में तुम्हारा सख्त लहजा, गुस्से वाली मुस्कुराहट, सब कुबूल पर कुछ भी कहना हराम था। 'नेताजी' का 'भौकाल', एकतरफा प्यार, काम की मार फिर भी लखनऊ में बहुत आराम था।। बेशक तुम्हारे आने से पहले चाय ही पहला और एकमात्र प्यार थी। इस एकाकी जीवन में हर दुख दर्द को बाँटने का बस वही आधार थी।।