क्या कभी सोचा है
ज़रा भी तुमने
सुरज जलता है
पर चांद नहीं
हवाएं चलती है
पर दिखती नहीं
किनारों पर लहरें आती है
पर ठहरती नहीं
पेड़ जीतें है
पर चलते नहीं
बादल गरजते हैं
पर कड़कते नहीं
सुबह उगती है
पर रात नहीं
मछली डूबती है
पर मरती नहीं
पंछी उड़ते रहते हैं
पर आसमां में रहते नहीं
कलम लिखती हैं
पर मिटाती नहीं
हम इंसान हैं
पर लगते नहीं
क्या कभी सोचा है
ज़रा भी तुमने


