शहरे -बे -मेहर में कौन किसको पहचानता है
मुंतज़िर है दिल तेरा और किसको जानता है
वक्त ए सफ़र करीब है कुछ दम साँस ले लूँ
दौड़ भाग में हयात ए ख्बा़व कहाँ संभलता है
चले हैं बुते गौहर खोजने निहां मिट्टी में जो
हासिल -ओ -लाहासिल जाने क्या तराशता है
आह! दस्ते तलब की सदा ना सुन सके हम
ठहर जा असीर, क्यों वजूद हमें पुकारता है
दरमियाँ से गुजर गई आंधी कुछ ऐसे हमारे
अब कू -ए-इंतजार में हवाओंं से डर लगता है


