नाकाम साजिशें सारी होती रही

और मैं मुस्कुराता रहा वो रोती रही


आगाज़े -हयात होता यूँ भी रहा..

जिंदगी रो कर खिलखिलाती रही


शहर में आ बसे, शहर से पराए

खेत की अपनी मिट्टी बुलाती रही


इस दहर में सारे पैकर मिट्टी के

धूप किश्तों में रोज पकाती रही


अजब शख़्स आ बसा ख्वाबों में

वो बिछड़ता रहा , मैं बुलाती रही

मकान कच्चा छोड़ गयी नन्ही गौरैया

धूप और बारिश में जहाँ पलती रही