वो रास्ता हम मंजिल बन कर दिखलाए तो
यह सफर और अब सफर खत्म हो जाए तो
हर शाख़ हरा-भरा होना चाहती दरख्तों की
दिल के जख़्म इस मौसम सब्ज़ हो जाए तो
फूलों को महकने की इजाज़त मिल रही है
इनायते इश्क़ जरा हुस्न की गली महकाए तो
कभी सोचता हूँ घर आँगन सा छोटा है मेरा
लेकिन दिल दरिया है ये बात उसे बतलाए तो
इस पुराने शहर में आईने नये रखें मिले हमें
किसी सरफिरे के हाथ पत्थर लग जाए तो
अपनी मौत पर रोज रोना आखिर कब तक
बंद मौजे- नफस पे हम हँस के दिखलाए तो


