भुला कैसे पाऊ 

उस आंगन की मिट्टी को,

बचपन जहाँ गुजरा मेरा ,

वो पगडंडियों वाला रास्ता 

आज भी मुझ को भाता है ,

जो मिलों चल पैदल मेरे घर को जाता है ,

दूर भला है इन शहरों की तकनीकों से ,

आज भी नीम की छांव में 

वो खाट बिछी मिलती है , 

शाम होते बैठक वहीं जमती है ,

परिहास भी होता है 

बिन रूठे हर शाम चांदनी साक्षी होती है,

चूल्हे की रोटी और कुँए का पानी 

आज भी घर घर मिलता है ,

मेरे गांव की हरयाली इन शहरों में कहाँ मिलती है,

इतना मोहक इतना प्यारा ,

खेल कूद जहाँ बीता सारा ,

वो आंगन आज भी मुझ को भाता है !!!