वक़्त की कैसी मार है 

ये जो चल रहा ,

कब ख़त्म होगा काल है ,

हर साँझ को निशा का,

और निशा को प्रभात का इंतज़ार है,

बदल रहा सब बदलाव के लिए,

छोड़ कर पीछे मूल्यों को,

आगे बढ़ रहा आज है,

वक़्त की कैसी ये मार है,

बिन पाप पुण्य का भेद किये,

निश्चिन्त हो बढ़ रहा अभिमान है,

देख कर भी मौन है जो 

कृतज्ञता का कसूरवार है,

वक़्त की कैसी ये मार है !!