चौराहों पर घंटों खड़ी ,

ना जाने क्या ढूंढ रही थी वो निगाहें 

होश न था ,शायद कोई विकार था 

मन अशांत था 

फिर भी चहरे पर कोई भाव न था,

मिल रही थी दुत्कार वहाँ भी 

जहां बढ़ रहे क़दम जरा भी ,

लोग कह रहे पागल था वो 

गूंजती रही थी वो कर्कशाहाट 

शायद उन कानों में ,

चलते शोर में एक सन्नाटा छाया 

जब वो कहीं टकराकर फिर उठ ना पाया ,

वो भीड़ बस खड़ी इस अंजुमन में थी,

कैसे विदा किया जाए ,

उन खुली आँखों में अभी भी कुछ तलाश थी ,

शायद किसी से बिछड़न थी 

या किसी की आस थी ,

दर्द उसका पहचाने बग़ैर 

मौत को उसके करीब कर दिया,

हक़ जता कर शायद ग़ैर कर दिया,

घुट घुट कर सहा इस ज़माने को 

अब बस कर मालिक उठा अपने परवाने को ,

रहम कर बंद करके उसकी तलाशती निगाहों को !!!