मैं से मैं तक के सफर में ,
मैं से हम तक सफर कहीं धुँधला हो गया ,
अटूट धागे का पक्का रंग फीका सा हो गया ,
धागा टूट कर बस गिरने की कग़ार पर था,
तभी एक हाथ बढ़ा और टूटते सिरे की छोर का थाम गया
वो हाथ तुम्हारा था मेरे हम के एक साथी का,
अपनी मैं की दौड़ में जिसे मैं भूल ही गयी थी,
और तुम्हारा इतना ही कहना -
"चलो,अपने प्रेम के मोतियों को फिर नए धागे में पीरोते है,
बीती कड़वी स्मृतियों के मोती न पिरोकर
प्रेम से साथ रहने की अनिवार्यता का मोती पिरोते है,
बस तुम्हारा इतना कहना मुझे फिर से हम के सफर में लौटा लाया ||

