हाँ,तुमने मुझे नौकरी करने की अनुमति तो दी

पर साथ ही ये सवाल भी रखे

"आज इतनी देर क्यों हो गयी "

"तुमने मेरा फ़ोन क्यों नहीं उठाया "

हाँ,तुमने मुझे मेरी पसंद का पहनावा पहनने दिया

पर किसी भी फंक्शन में जाने से पहले

तुमने मुझे सुझाव दिया

"तुम वहाँ सिर्फ साडी पहन कर चलना,

वरना लोग बातें बनाएगे"

हाँ ,तुमने मुझे मेरे मायके भी जाने दिया,

पर उसमे भी शर्ते थी

" जा तो रही हो पर दो दिन में आ जाना,

या अभी तो पिछले महीने ही गयी थी "

हाँ , तुमने मेरी पसंद का ख्याल भी रहा है

पर उनमे भी तुम्हारी इच्छाओ को शामिल किया है ,

हाँ ,ये भी सच है तुमने मुझे उड़ने तो दिया है

पर मेरी उड़ान को सीमाओं में बांध दिया

मानो तो मेरे पंखों को तुम्हारी सोच की ज़ंज़ीर से बांध दिया

ताकि वो उड़े तो सही पर तुम्हारी निर्धारित सीमाओं को न लांघे ,

तुम हर बार मुझसे सवाल करते थे ना

तो आज मैं तुमसे पूछती हूँ

आख़िर.........

मुझे तुम्हारी अनुमतियों की जरुरत ही क्यों है,

मेरी आशाओं को किसी स्वतंत्रता की जरुरत ही क्यों है,

मेरी ही उड़ान को सीमाएँ क्यों चाहिए ,तुम्हारी को क्यों नहीं

मानती हूँ ये रिश्ता एक डोर से और कुछ वचनों से बंधा है ,

पर शायद तुम भूल गए उन वचनों में मेरा भी साँझा था,

जिसका ज़िक्र तुम मेरी हर बात के जवाब में करते हो ,

तुमसे कोई सवाल नहीं करती

बस चाहती यही हों

तुम भी मेरे साथ चलो

जैसे की मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ

मैं विश्वास करती हूँ

वैसे ही तुम भी मुझ पर करो

हाँ ,बस यही सवाल थे मेरे मन में,

सोचा आज पूछ ही लू

और थोड़ा मन हल्का कर लू

एक बार इस विषय में सोचना जरूर

क्या पता तुम मेरी सीमाओं को थोड़ा और बढ़ा दो !!!!