जन्नते भी करती थी हमारी नग़मों का बेसब्री से इंतजार ना नगमे वो रही ,ना हम वो रहे ।।

नशा ए शराब किया करते थे हम कुछ इस क़दर अब ना नशा वो रहा ना हम वो रहे ।

फिज़ाओ में फैले थे चर्चे हमारी मोहब्बत के भी

ना फ़िज़ाय वो रही ना हम वो रहे।

इंतेहा तो तब हो गयी हुज़ूर ना रहने की जब ना सुनने वाले वो रहे ना सुनाने वाले हम।