पहले माँ बाप बच्चों को
अपने हिसाब से बड़ा करते थे।
आजकल माँ बाप की उम्र
बच्चों के हिसाब से ही बढ़ रही है।
माँ ग्यारस को
चावल नहीं पकाती थी।
पिताजी को गैस थी
उन्हें सिर्फ लौकी भाती थी।
दादी के दाँत नहीं थे
दलिया ही खाती थी।
दादा की रोज़ एक
नई फ़रमाइश आती थी।
माँ स्कूल टिफ़िन में बे-नागा
परांठा-अचार ही लगाती थी।
अब तो चूल्हों पर रेसिपी
बच्चों की इच्छा से ही चढ़ रही है।
आजकल माँ-बाप की उम्र
बच्चों के हिसाब से ही बढ़ रहीहै।
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हर सुबह
बेटी के सिर में तेल डाल
कस कर दो चोटी हो जाती थी।
जब भी बेटे को ज़रूरत पड़ी
पिताजी की कोई पैंट
उधड़ कर छोटी हो जाती थी।
फेरों पर दुल्हन की चुनरी और
विदा में कौनसी गोटा-किनारी हो
मौसी का मशवरा
और ताई की ताकीद
कसौटी हो जाती थी।
आज तो
उनके भी क्या कहने हैं।
माँ-बाप ने दुल्हन की पसंद से
डिज़ाइनर कपड़े पहने हैं।
और दूल्हे की सुझाई थीम तो
नए पैमाने ही गढ़ रही है।
आजकल माँ-बाप की उम्र
बच्चों के हिसाब से ही बढ़ रही है।
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हॉस्टल वापसी पर
ट्रेन के सफ़र को
नसीहतें हज़ार होती थी।
कोई परिचित सहयात्री मिल जाए
ढूंढने की कोशिशें
अपार होती थीं।
सफ़र में बिटिया का ज़रा रख लेना ख्याल
पिताजी की टी टी से हर-बार
यही मनुहार होती थी।
ट्रेन से उतरते ही, लेने को
पिताजी के दोस्त की
एम्बेसेडर तैयार होती थी।
सकुशल पहुँचने का
ट्रंक-कॉल ना पहुँचे,
तब तक माँ कितनी बेज़ार होती थी।
आज यूँ तो बेटे ने
ऑन-लाइन टिकट भेज रखा है।
मगर कम्बखत मोबाइल ने उसे
जाने कहाँ सहेज रखा है।
कमज़ोर परीक्षार्थी से बेचैन
माँ-बाप की नज़र,
ट्रेन में बगल वालों से पूछ
उसे ढूंढ और पढ़ रही है।
आजकल माँ-बाप की उम्र
बच्चों के हिसाब से ही बढ़ रही है।