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मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक - कुमार विश्वास

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा तुम ग़ज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा ज़िन्दगी के सभी रास्ते एक थे सबकी मंज़िल तुम्हारे चयन तक रही अप्रकाशित रहे पीर के उपनिषद् मन की गोपन कथाएँ नयन तक रहीं प्राण के पृष्ठ पर प्रीति की अल्पना तुम मिटाती रहीं मैं बनाता रहा एक ख़ामोश हलचल बनी ज़िन्दग
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