चराग़ जो हमने जलाया था तो उसे बुझा क्यों दिया?

जब मन ही था जाने का, तो फिर गिला क्यों किया?


जब महफ़िल सजने से पहले ही जाने की थी तमन्ना, तो वहाँ मौज़ूद हर शख़्स से मुझे यूँ मिला क्यों दिया?


इश्क़ था कहती थी हर बार मुझसे मिलने पर ये तुम,

दिल में चाहत थी, तो बेवफ़ाई का ये सिला क्यों दिया?


कहतीं थी बनकर रहूंगी दिल में एक दरख़्त बनकर,

ऐसा क्या हुआ वक़्त से, कि दरख़्त हिला क्यों दिया?


था सब कुछ शांत, न ही किसी मुसीबत की आशा थी,

ऐसे माहौल में फिर तुमने मुझे,ये जलजला क्यों दिया?