उम्मीद
डॉ. भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित ‘भुवन’
तेरे ख़यालों की धूप में भीगता रहा मैं,
ख़ामोशियों के शहर में जागता रहा मैं।
कभी जो टूटा, तो फिर से जोड़ता रहा दिल,
हर एक ज़ख्म को अपना बनाता रहा मैं।
वो रास्ते जो मुझे मंज़िल तक ले न पाए,
उन्हीं पे चलकर भी मुस्कुराता रहा मैं।
हवा ने कितनी ही बार रुख़ बदला सफ़र में,
मगर उम्मीद का दीप जलाता रहा मैं।
कभी जो पूछा किसी ने मेरा हाल-ए-दिल तो,
हँसी के पीछे बहुत कुछ छुपाता रहा मैं।
अँधेरों से भी मेरी दोस्ती रही कुछ ऐसी,
उजालों का सफ़र भी निभाता रहा मैं।
