दौर-ए-फ़रेब
— डॉ. भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'
रोशनी से छुप के अँधेरा बोलता है,
अब चिराग़ भी हवा से डरकर बोलता है।
ज़हर घोल देता है फ़िज़ाओं में अक्सर,
जो लहजे में चाशनी घोलकर बोलता है।
आईना भी झिझकने लगा है सच कहने से,
तारीफ़ में तो यहाँ हर पत्थर बोलता है।
अदालत में मुंसिफ़ भी ख़ामोश रहता है,
जब फ़रेब का चेहरा नक़ाब ओढ़कर बोलता है।
साज़िशों के बाज़ार में हुनर यही सीखा उसने,
पीठ में ख़ंजर घोंपकर, मुँह से ज़फ़र बोलता है।
'भुवन' ख़ामोशी ही भली ऐसे दौर-ए-फ़रेब में,
जहाँ सच की ज़ुबाँ काटकर, झूठ सर चढ़कर बोलता है।
— डॉ. भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन
