मत  पूछ  कि  बुलंदी  पर  कैसा  लगता है,

सुकून की सांस के लिए भी पैसा लगता है।


बिना परखे किसी पर विश्वास नहीं करना,

कोई वैसा होता   नहीं  है  जैसा लगता है।


सोने के बर्तनों में भी खा कर देख लिया,

वैसा ही लगता है जैसा सब में लगता है।


गगनचुंबी  इमारतें  भी  हो जाती है धराशाई,

वहम में सच होता नहीं है बस ऐसा लगता है।


ज्यादा दौलत भी जान ले लेती है शक्ति,

सारा जहां सोने के पिंजरे सा लगता है।


✍️ दशरथ रांकावत 'शक्ति'