"समा नहीँ सकते संपूर्ण ज्ञान को अपने में
तो श्रेष्ठ होने का अहँकार जला डालो
प्रकृति का योग है बदलाव की धारा
अपने इस सुख के ठहराव को बदल डालो
प्रकाश नहीँ देता दीपक जले बिना
परिश्रम का ये सूर्य चमका डालो
नदी खो देती है दिशा बहाव का
अपने इन किनारो को रोके डालो
होता नहीँ कुछ समय के बिना पूर्व
इस उत्सुकता का रथ बदल डालो
कुछ संभव नहीँ बिना ऊर्जा बिना भाव के
शिथिलता के इस भाव को बदल डालो
विद्यार्थी बने रहो गुरु नहीं तथा
बुद्धि पर डला आवरण त्याग डालो
सुंदरता होती है स्वछ मन की आत्मा की
इसीलिए मलिन मन के वस्त्र उतार डालो
घातक है वास्तविकता से अनभिज्ञ रहना
तो अंधश्रद्धा का चोगा हटा डालो
प्रदूषित करे बुद्धि को पूर्वानुमान का भाव
नेत्रों पर पड़ा ये निस्पंदन हटा डालो
मुक्त होना हो जाता है असंभव
तथा इस जड़ता को उखाड़ डालो"
– योगेश


