वक्त के विपरीत बहता रहा मै ,

अपनों को गैरों सा दूर करता रहा मै ,

किसी ने उठा कर भी देखी नहीं अर्थी मेरी ,

ता उम्र ऐसी चाल चलता रहा मै। 


जब भी चाहा उसने रोक ले वो मुझे ,

हर उस मोड़ पर राह बदलता रहा मै ,

आज भीड़ में भी तन्हा खड़ा हूँ मै ,

कि खुद की नज़रों में कितना गिरा हूँ मै। 


कब की थी इस वक़्त की परवाह मैंने ,

कब किया था अपनों से प्यार मैंने ,

जो कहा और जो किया सब झूठ था वो ,

इन्सान होने का बहुत गरूर था वो,

आज ला कर रख दिया है जमीं पर समय ने ,

कितना बहता ? बहते बहते थक गया हूँ ,

कि वक़्त के विपरीत बहता रहा हूँ। 


सोचता हूं अब ठहर कर कुछ पल ही सही ,

अपने अन्तर्मन के गर्भ की गहराइयों से ,

मुड़ के देखूं क्या खुदा ने था बनाया ,

क्या वही करुण दिल इंसां रह गया हूँ?


कितना बहता ? बहते बहते थक गया हूं ,

कि वक़्त के विपरीत बहता रहा हूँ मै ,

ता उम्र ऎसी चाल चलता रहा हूँ मै। 


संतोष " सशक्त "