ज़िंदगी इक सज़ा...'s image
Poetry1 min read

ज़िंदगी इक सज़ा...

Dr. SandeepDr. Sandeep December 10, 2021
Share0 Bookmarks 81971 Reads3 Likes

ज़िंदगी गुजर रही मेरी एक मुल्ज़िम की तरह

ज़ुर्म इतना कि तुम्हें खोने की सज़ा पा रहा हूँ..

तेरी यादों में मैंनें ख़ुद को यूँ बिख़रा दिया है

अब अपने ही टुकड़ों को कंधों पर ढोए जा रहा हूँ..

ये रौनक़ देखकर मुझे तुम्हारा ख़याल आता है

पर मैँ सर-ए-बाज़ार में अकेले ही चले जा रहा हूँ..

क्या बद-दुआ मिली मुझे जो तेरा हाथ यूँ छूटा

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts