मेरे आँगन में लगे पेड़ अपनी जड़ों को छोड़ चले 

दरख़्तों पर बसे परिंदे घोंसलों से मुँह मोड़ चले.. 

भटक रहा है ये मुसाफ़िर धूल के उड़ते गुबार में

ज़िंदगी के सफ़र में रास्ते भी साथ छोड़ चले..

ऐसा उजड़ा गुलिस्ताँ बसा हुआ इस बनारसी का

बहार में शाख़ पर खिले फूल भी साथ छोड़ चले..

सारी उम्र गँवा दी थी गुलज़ार-ए-जहाँ बसाने में

पर बेशकीमती सी मेरी दुनिया वो सस्ते में छोड़ चले..

खुशनुमा थी मेरी जिंदगी तकलीफ़-ए-सफ़र हो गई

जो हर क़दम साथ चले वो मुसाफ़िर भी साथ छोड़ चले..!!

#तुष्य