लफ़्ज़ दिल से...
लफ़्जों की ज़रूरत नहीं तेरे दर्द-ए-दिल को जानता हूँ
सैंकड़ों आवाज़ों की भीड़ में तेरी ख़ामोशी पहचानता हूँ..
तुमने इस मुस्कुराहट के पीछे लाखों दर्द छिपाए रखे हैं
मैं तेरी तकलीफ़ों के सामने अपना सीना तानता हूँ..
उठती नहीं ये निगाहें अब किसी और की तरफ
तेरे जज़्बात-ए-दिल की वज़ह से तुझे अपना मानता हूँ..
अपरिचित है पर अब पहचान हमारी अजनबी नहीं रही
अनजान होते हुए भी तेरी क़लम और स्याही पहचानता हूँ..
तेरे शब्दों के जादू को और चमकता हूँ निखार लाता हूँ
तेरे इस लख़नवी अंदाज़ वज़ह से तुझे नूर-ए-क़लम मानता हूँ..!!
#तुष्य



