फिर एक ख़्वाब-ए-दिलनशीं आलम-ए-ख़याल आया
लबों पर देख उसके मुस्कान ख़ूबसूरत सवाल आया..
इन सियाह ज़ुल्फ़ों के साए में छुप कर जी लें क्या
जवानी के नग़्मे फ़िज़ा में गूंजे वक़्त-ए-विसाल आया..
ये सुनते ही चमक उठा महताब सा चेहरा उसका
पैग़ाम-ए-इश्क़ सुर्ख़ गुलाब रूप क्या बेमिसाल आया..
इस बात पड़ी है यार नज़र-ए-करम उनकी
लिखते-लिखते संदीप नज़्म में क्या कमाल आया..
पर हक़ीक़त-ए-हाल मचा बवाल हुआ बेहाल दोस्तों
मेरी आँखों के दरिया में फिर दर्द का उबाल आया..!!

