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जंग-ए-इश्क़…

अगर तेरी ज़िद है सितमगर मुझपर बिजलियाँ गिराने की

तो मेरी भी ज़िद है दिल-ए-सख़्त वहीं आशियाँ बसाने की

हिम्मत और हौसले बुलंद हैं मेरे देख अभी गिरा नहीं हूँ

अभी तो जंग-ए-इश्क़ बाक़ी है तेरे दिल में उतर जाने की..!!


सुन दिल-ए-बेदर्द ज़ुल्म-ओ-सितम सहने की आदत है मुझे

जानता हूँ तरक़ीब जो तूने अपनाई मुझ पर ज़ुल्म ढाने की

तू चाहे कितना भी कर ले अपने इस मुरीद को नज़रअंदाज़

पर मैं मरते दम तक करता रहूँगा कोशिश तुझे मनाने की..!!


वो भी वक़्त था जब तुम रोज़ पूछा करते थे हाल-ए-दिल मेरा

पर आज नहीं लेते ख़बर बज़्म-ए-अख़्तर में अपने दिवाने की

अगर मेरा दिल-ए-मुज़्तर चाहता तो मुझे संग-दिल बना देता

लेकिन मैंने नहीं की कभी कोई परवाह

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