लाल कुर्ती में हुस्न-ए-लाज़वाब हो तुम
बिना मेकअप ख़ूबसूरत बेहिसाब हो तुम..
बगैर तुम्हारे मेरे अल्फ़ाज़ अधूरे रहते हैं
मुझ शायर का मंज़िल-ए-ख़्वाब हो तुम..
बेशक मुझ अहल-ए-क़लम से थोड़ा दूर हो
दिल की नज़र से देखो कितने पास हो तुम..
तेरे लफ़्ज़ों की ख़ुशबू बसी है मेरी साँसों में
साहिब-ए-क़लम नज़्मों में लाजवाब हो तुम..
मैं डिब्बी में बंद जुगनू सा जगमग करता हूँ
पर बाम-ए-फ़लक पर दमकता माहताब हो तुम..
मरीज़-ए-मोहब्बत बन गया हूँ तेरे ख़यालों में
मुझ दिल-ए-ज़ार का आब-ए-हयात हो तुम..!!
#तुष्य


