सियाह रातों में हम ख़ुद से लिपट कर रोए बहुत हैं
दहकते दिल के दरिया में बदन भिगोए बहुत हैं..
याद-ए-मेहबूब में खुली नज़र से गुज़र गईं जो रातें
उन रातों में दिल के टुकड़े कंधों पर ढोए बहुत हैं..
अब ज़िंदगी गुज़र रही मेरी एक मुल्ज़िम की तरह
जो ख़्वाब थे सजाए गर्दिश-ए-तक़दीर खोए बहुत हैं..
अब न आँखों में नींद है न ही इस दिल में क़रार
मैंने सैल-ए-अश्क़ में दिल के सफ़ीने डुबोए बहुत हैं..
अब ये दर्द-ए-जुदाई और नहीं सही जाती मुझसे
मैंने गुलाब की खोज़ में ख़जर से काँटे चुभोए बहुत हैं..!!


