होश खो मौज-ए-मोहब्बत में इस क़दर बह गया
जो अभी न कहना था उस से वो भी कह गया..
लब-ए-ख़ामोश से जो अफ़साने बयाँ ना हुए कभी
कँपकँपाते होंठों से दिल के सारे फ़साने कह गया..
हर-लफ़्ज़ हर-अल्फ़ाज़ बुने थे मैंने उसकी यादों में
कुछ नज़्म बन ढल गए कुछ अश्क बन बह गया..
दर्द का दरिया आँखों से झर झर गिरता हो जैसे
ये मक़ान-ए-जिस्म ज़ख़्मों से जर्जर हो ढह गया..
न जाने कितने ही ख़्वाब बसाए थे इन आँखों में
वो सारे ख़्वाब अब बस एक राज बनकर रह गया..!!
#तुष्य



