रख कर तुझे दिल से दूर फ़िर भी ज़िंदा हूँ मैं

पेड़ की टूटी शाख़ पर सहमा बैठा परिंदा हूँ मैं..

पता है मैं खरा नहीं उतरा तेरे तक़ाज़े पर कभी

राह-ए-इश्क़ के बीच तेरा हाथ छोड़ शर्मिंदा हूँ मैं..

अब जी रहा हूँ अकेला यूँ ख़ुद-ग़रज़ी में जिंदगी

तभी कहते हैं लोग बन गया शैतान दरिंदा हूँ मैं..

बेज़ार ज़िंदगी का बनकर नुमाइंदा अकेला तन्हा

किताब-ए-हयात में दर्ज ग़लतियों का पुलिंदा हूँ मैं..

पर मुझसे नफ़रत करने वालों बात गौर से सुन लो

दुनियां जिसे तोड़ न सकी उन लोगों मैं चुनिंदा हूँ मैं..!!