जो दर्द लफ़्ज़ों से बयाँ होता है 

वो दर्द नज़रों में कहाँ होता है... 

निग़ाहों से गुफ़्तगू हो सकती है 

पर अल्फ़ाज़ों में दर्द-ए-जहाँ होता है.. 

मानता हूँ आँखें दीवाना बना लेती हैं

पर नज़्मों में हुस्न-ए-बयाँ होता है..

आँखें इश्क़बाज़ों को घायल कर सकती हैं

पर ग़ज़लों से ज़ख़्म-ए-दिल जवाँ होता है..

अगर मोहब्बत चाहिए तो नज़रों में डूबना

पर सुकून के लिए शायरों का बज़्म-ए-समाँ होता है..!!

#तुष्य