जब मेरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई
ज़िंदगी से खुल कर बात हुई
मुद्दतों के बाद मुनाजात हुई
अश्क-ए-ग़म की बरसात हुई..!!
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ज़िंदगी से पूछा क्यों नाराज़ हुई
क्यों ख़ुशियों पर इग़्माज़ हुई
क्यों मेरी बर्बादी-ए-हालात हुई
इल्तिफ़ात बन क्यों ज़ुल्मात हुई..!!
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वो बोली मैं न दग़ाबाज़ हुई
न बेवफ़ा हुई न बद-ज़ात हुई
न ही मोरिद-ए-आफ़ात हुई
बस थोड़ी तल्ख़ी-ए-हालात हुई..!!
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अब तेरी एक नई शुरुआत हुई
हम-क़लमों से मुलाक़ात हुई
लफ़्ज़-ए-क़लम की करामात हुई
ख़ूबसूरत नज़्मों की बरसात हुई..!!
#तुष्य
मुनाजात: कानाफूसी इग़्माज़: तिरस्कार दिल-ए-फ़य्याज़: दरियादिल, इल्तिफ़ात: कृपा, ज़ुल्मात: कठोर, मोरिद-ए-आफ़ात: मुश्किलों, तल्ख़ी-ए-हालात: स्थिति की कड़वाहट


