मेरे ख़्यालों और ख़्वाबों की दुनिया

सुकूँ देती है ये किताबों की दुनिया..

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का इन्हीं से सीखा

अंधेरों से निकाले चराग़ों की दुनिया..

पर जैसे ही पलटा ज़िंदगी का पन्ना

सवालों में उलझी जवाबों की दुनिया..

उन्हीं पन्नों के बीच बे-ख़ुश्बू फूल सी

काग़जों में बसाई थी गुलाबों है दुनिया..

अब इल्ज़ाम किसे दूँ ऐ दिल-ए-बर्बाद

लिखी ख़ुद मैंने ही अज़ाबों की दुनिया..

फँस गया ज़ाल-ए-दुनिया में ये बनारसी

यहाँ हर चेहरे के पीछे नक़ाबों की दुनिया..!!